सोमवार, 22 अगस्त 2016

हमारा कोलंबस सफर


हमारा कोलंबस सफर

हाल ही में हम कोलंबस गये थे सुंहास और विजय अब मार्टिनबर्ग से वहाँ जाकर बस गये हैं। वे रहते हैं डेलावेअर यानि कोलंबस के एक उपनगर में। मार्टिन बर्ग के जितना बडा तो नही पर सुंदर सा घर है। तीन बेडरूम  बैठक खाना रसोई आगे पीछे बैठने के लिये खुली जगह वगैरा वगैरा। सुबह की चाय के साथ पंछियों को  सुहास दाना डालती है तो उनका संगीत चाय का मज़ा दुगना कर देता है।
(Img 2570 & 2572)




चाय के बाद सुबह की सैर पर चल पडो तो छोटे छोटे  3-4 तालाब आपके सैर की खुशी बढाते हैं । तालाब में बत्तखों की टोली निर्बाध घूमती होती है पर हमारी आहट पर इधर उधर छुप जाती है। रोज ही इन बत्तखों को देख कर हम आनंद उठाते। (MvI 2519)

एक बार तो उनके छोटे छोटे बच्चों की टोली भी थी माँ के साथ।
उसके भी  आगे एक छोटासा सैर पथ है वहां के पेड पर एक काले रंग का खूबसूरत पंछी जिसके परों में लाल या गहरे नारंगी रंग का पट्टा है हमारा स्वागत तरह तरह की बोलियों से करता है। उसका नाम है Red winged bird।
चित्र विडियो


घर आकर फिर नाश्ता फिर एक घंटे बाद व्यायाम  फिर हम दोनो मिलकर खाना बनाते
और फिर निकल पडते बाजार । बाजार घर से काफी नजदीक है और वहां पर काफी सारे हमारे रुचि की दूकानें भी हैं। वहां से घर के लिये सामान लेते, कुछ मुझे लेना होता तो वह भी।
घर आकर खाना खाने से पहले या बाद में ब्रिज़ का गेम जमता। उनके वहाँ दो सीनियर सिटिझन सेंटर हैं एक हिन्दुस्तानी और एक अमेरिकन वे दोनों जगह के सभासद हैं। दोनो ही जगह हम होकर आये और ब्रिज भी खेला।  
वहाँ पर हमने मिल कर सत्यनारायण भगवान की पूजा भी की। (Img 2562) प्रसाद और भोग का खाना मैने बनाया पूजा की तैयारी सुहास ने की।

एक सुबह जब हम थोडा सुस्ताने के लिये एक बेन्च पर बैठे तो एक पेड के फुनगी पर एक छोटी सी सुंदर सी पीले रंग की चिडिया दिखी उसका फोटो हम तो नही ले पाये लोकिन  इंटरनेट पर उसकी तस्वीर मिल ही गई। उसका नाम है, Prothonotary Warbler Maggy marsh.


सुहास के घर से नजदीक ही एक बडा सा लेक भी है जेसे कि छोटा मोटा समुद्र हो वहाँ एक पार्क भी है हमने वहाँ पिकनिक भी मनाई। लेक का नाम है,Alum Creek Lake । वहाँ कि नदी का नाम बडा मज़ेदार है उलनटांगी। जेसे कि उलटी-टांगी कह रहे हों।



इस तरह पंद्रह दिन सुहास के साथ मजे में बिताकर 18 तारीख को हम अमित के यहाँ डरहम, न्यू हैम्पशायर पहुँचे।



रविवार, 14 अगस्त 2016





सभी ब्लॉगर बंधु भगिनियों को स्वतंत्रता दिवस और राखी की शुभ कामनाएँ ।

शनिवार, 6 अगस्त 2016

क्या सचमुच ..

क्या सचमुच कोई नेता नही चाहता
कि देश तरक्की करे,
लोगों को काम मिले,
उनके सर पे भी छत हो,
बदन पर कपडा।
उनके भी बच्चे जायें स्कूल,
बगिया मे खिले फूल।
खेतों में अनाज हो,
समंदर में देश के जहाज़ हों
बीमारों को दवा मिले,
साफ सुथरी हवा चले।
सैनिक रहें सज्ज सदा,
मिले उन्हे सम्मान और मुआवजा।
पडोसी देशों से मेल हो,
शांति से खेल हों।
वे भी और हम भी रहें खुशहाल,
किसी के दिल में ना हो मलाल।
प्रकृती की मार तो पडती ही है,
पर सरकार क्यूं हम से अकडती है।
क्या सचमुच कोई नेता, कोई अफसर,कोई नही चाहता
कि लोगों का काम हो
और उसका भी नाम हो।

हाँ एक नेता है ऐसा, जो चाहता भी है और कर भी रहा है । बस थोडा धीरज रखना होगा।



शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

वो दिन हवा हुए

वो दिन हवा हुए, जब पसीना था गुलाब,
आँखों में रंग थे और थे सुनहरे ख्वाब।

मेरे सवाल से पहले आता था उनका जवाब,
जिस काम को छूते हम बन जाता था सवाब।

रौनकें लगी रहती थीं हर तरफ,
रोशनी के चाशनी का माहौल हर तरफ,
रातें थीं चांदनी की और हम थे माहताब।

अब आज का जिक्र क्यूं कर करेंगे हम,
यादों की जब रखी हुई है खुली किताब। 

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

छटने लगे हैं अंधेरे

छटने लगे हैं अंधेरे
घुल गये बादल घनेरे,
रोशनी सी फैलती है
किरणों ने डाले बसेरे।

अभी कुछ है धुंद बाकी,
अभी हैं साये हाँलाकि,
राहें नजर आने लगीं हैं,
उजलते मंजिल के डेरे।

नाव डगमग डोलती थी,
कुछ भंवर को तोलती थी,
ले ही आया है ये नाविक
धीरे धीरे तीरे तीरे।

अब है आगे तेज़ धारा,
पर है मजबूती सहारा,
मंजिल बहुत है दूर अब भी
पर है पथ दीपक उजेरे।

हम हैं तेरे साथ नाविक,
और ऊपर वाला मालिक,
तेरे हाथों हाथ देकर
चल पडें सारे के सारे।

चित्र गूगल से साभार।

रविवार, 12 जून 2016

जीवन की यह अजब पहेली

कभी कहानी बहती रहती, कभी मोड पर रुक जाती है।
कभी कविता सी मचलती रहती, कभी अडियल सी ठहर जाती है।

कभी सुरों की सजीली महफिल, जमते जमते उठ जाती है,
बजते बजते ही सितार की तार टूट के सिहर जाती है।

हीरा तराशते तराशते, जैसे कोई दरार पड जाती,
जानें कितनी सुंदर कलियाँ बिना खिले मुरझा जाती हैं।

मन के इस चंचल से पट पर जब कोई आकृति उभरती,
जाने क्या हो जाता है कि बनते बनते मिट जाती है।

मंदिर की घंटी का मधुरव, कानों में रस घोल रहा हो,
कैसे कोई कर्कश सी ध्वनी, लय, ताल बिखरा जाती है।

लहरों पर खेलती नाव जब लहर लहर मचलती होती,
कभी अचानक भँवर में फँस कर वजूद अपना खो जाती है।

राह एक पकड के राही मंजिल अपनी पा जाता है
तब जीवन की अजब पहेली उलझ उलझ के सुलझ जाती है।

गुरुवार, 2 जून 2016

इंतजार में

मुद्दत हुई कि बैठे हैं बस इंतज़ार में,
काटीं हैं सुबहें,रातें कितनी,इंतज़ार में।















करके गये थे वादा,जल्द लौट आयेंगे,
अब भी सहन में बैठे हैं हम इंतज़ार में।

ये कुछ ही दिन फुरकत के हैं,कहके गये थे,
आयेंगे लेके अच्छे दिन, कुछ इंतज़ार में।

आँसूं भी गये सूख, हँसी फीकी हो गई,
गुज़रा हमारे साथ क्या,इस इंतज़ार में।

हम ख़ुद को भुला बैठे हैं,याद में तेरी,
तू है कि हमें रखता है बस,इंतजार में।

सोचा था आयेंगे गर उम्दा ख़याल तो,
हम भी तो कुछ लिखें, हैं बस इंतज़ार में।

कर लेंगे दिन ये पार,रख के हौसला सनम,
न सोचना कि मर जायेंगे हम इंतजारमें।




चित्र गूगल से साभार।