शुक्रवार, 5 मई 2017

कितने जतन किये

कितने जतन किये
तुमसे मिलने के

भिजवायें अनगिनत संदेसे
चिठिया पत्तर भेज के देखे
हवा पखेरू के संग अपने,
दुखडे कथन किये
कितने जतन किये।

सखा तुम्हारे, सखियाँ मेरी
दुखसे मोर जो थीं दुखियारी
जा जा कर के पास तिहारे
कष्ट निवेदन किये
कितने जतन किये।

तुम न पसीजे,तुम ना आये
क्यूं इतने कठोर हो पाये
क्या ऐसी मोसे भूल हो गई
जो ये मरन जिये
कितने जतन किये।

अब आजाओ न और रुलाओ
एक बार दरस दे जाओ
फिर चाहे वापिस ना आओ
कोई रहे या कि मिये
कितने जतन किये






रविवार, 30 अप्रैल 2017

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

बादलों के उस पार

बादलों के उस पार कोई तो जहाँ होगा,
जहाँ हमारा भी इंतजार हो रहा होगा।

खूबसूरत अलग से झरने होंगे,
रंगों का कोई अनोखा सा समाँ होगा।

हमारे संगी साथी जो यहाँ बिछुड गये, होंगे
धुंआधार बारिशों से धुला आसमाँ होगा।

रुपये पैसे की जरूरत ही नही होगी,
खाना पीना भी तो मुफ्त ही वहाँ होगा

या फिर भूख प्यास ही नही होगी,
तृप्ति का अहसास ही सदा होगा।

हमारी सोच भी तो इस जहाँ की है,
ना जाने कौनसा नया मंजर वहाँ होगा।

जो भी होगा बहुत खूबसूरत होगा
ये यकीन हमारा भी सही होगा।


बुधवार, 12 अप्रैल 2017

कितना कुछ

तारोंभरा आसमान निहारते हुए
कितना कुछ याद आता है।
परिक्षा के बाद गर्मी की छुट्टियों में
रात छत पर सफेद चादरों वाले बिस्तर पर
बैठ कर बतियाना,
परिक्षा खत्म होने की खुशी और साथ साथ
नतीजे की प्रतीक्षा और तनाव
वह  एकदूसरे को ढाढस बंधाना,
हाथों को हाथ में लेकर।
अचानक एक सिहरन, एक बिजली सी महसूस होना
मेरा हाथ छुडाकर नीचे भाग जाना
क्या यही प्यार था,
आज इतने सालों बाद यह याद कर के
हंसी भी आती है और एक बेचैनी भी होती है दिल में
क्या वह प्यार  था  अगर था तो थोडी सी हिम्मत दिखाने से परवान चढता?


बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

कब हमने सोचा था

कब हमने सोचा था कि ये पैर डगमगायेंगे,
बेटे हमारे लिये फिर लाठी ले के आयेंगे।

खाना बनाने से भी हम इतने थक जायेंगे
सीढी बिना रेलिंग की कैसे हम उतर पायेंगे।

लेकिन ये हुआ है तो अब मान भी हम जायेंगे
जो जो सहारा लेना है लेकर उसे निभायेंगे।

मन माफिक खाना पीना भी भूल जायेंगे,
सरे शाम ही अब खाने से निपट जायेंगे।

हलका फुलका और दाल से निभायेंगे,
एक ही काफी है अब दो कहाँ खा पायेंगे।

घूमने जाना तो फिर कोई साथ ले के जायेंगे
अकेले से तो जानें की हिम्मत क्या बटोर पायेंगे।

बुधवार, 9 नवंबर 2016

फिर कविता



मेरी कविताएं नाचती हैं मेरे खयालों में।
घूमती हैं गोल गोल मेरे चारों और,
एक नई अनछुई कविता लेने लगती हा आकार
उनके बीचोंबीच।
जिसका हरियाली का लेहंगा, फूलों की चोली,
चांद सितारे टंकी झीनी झीनी चूनर,
उसके बादल से काजल काले गेसू।
सके अलंकार, उपमा, उत्प्रेक्षा, श्लेष,
अपन्हुति, अन्योक्ति और जाने क्या क्या।
धीरे धीरे साफ होती जाती है उसकी आकृति मन दर्पण में
और मै उठा लेती हूँ कलम।



कविता, कविता का जन्म

सोमवार, 7 नवंबर 2016

घुटने की शल्यक्रिया के बाद




घुटना बोलता है,
जब उसे दुख  होता है
साथ छूटने का, साथी जो
उसके अपने थे।
होता है उनको भी दुख
अपने पुराने साथी से बिछडने का
उसकी जगह लेने वाले नये साथी से उनकी बनती नही है अभी।
नयी बहू की तरह सब की परीक्षा के घेरे में है वह।
इसीसे दुखी है और उसके दुख से मै दुखी।
पर धीरज रखना है। नई बहू को भी सब अंततः स्वीकार कर ही लेते हैं।
इसे भी कर लेंगे बल्कि कर ही रहे हैं।
उसका और मेरा दुख भी थोडा थोडा
हल्का हो रहा है।
जल्द ही वह भी हो जायेगा हिस्सा इस पैर का

फिर वह भी घुल मिल के रहेगा सबके साथ।